खामोश हूं पर अंजान नहीं
सब जानकर भी चुप हु पर अंजान नहीं
क्यों लोग इन खामोशियों को रशक़त समजते हैं
क्या मसला है उनको मेरी आवाज़ की गैर मौज़ूदगी से
इसी निश्चलता से तो जुडा हुआ हूं सबसे
इसीलिए सब जानने के बावजूद भी में अंजान नहीं
रवैया तबदील नहीं हुआ, बस चुप्पी हमारी फितरत बन चुकी है
लोगों की गेहराई आंकना सिखाती है ये चुप्पी
कौन अपना है और कौन पराया, यही तो ऐहसास दिलाती है चुप्पी
यही तो नेकी है इस चुप्पी की
इसीलिए सब जानने के बावजूद भी में अंजान नहीं
रात गुज़री दिन आया हम गए कोई और आया
कल तक हम उनके तरज़ीह थे आज कोई और है
फिर रात होगी फिर कोई और आएगा, ये सिलसिला युही चलता जाएगा
बोहोत उलज गए तुमहारी इन लज़ीज बातो में, आने वाला भी फसेगा इन बनावटी बातो में
इसीलिए सब जानने के बावजूद भी में अंजान नहीं
क्यों तवज्जोह देते है लोग इन फ़र्ज़ीओ को
क्यों बावले बनते है इनकी मीठी बातो से
नज़रिया तबदीली रग में है उनके, मत जा पगले तज़ुर्बा है हमे
क्यों बनता है बेख़बर मेरे केहने पर भी
में भी फसा था तू भी फसेगा सब जानकर भी
इसीलिए सब जानने के बावजूद भी में अंजान नहीं
मक़बूल बनाके रखेंगें नहीं जाने देंगे दूर
बेहलायेंगे फिसलाएँगे करेंगें सब से दूर
चुगलखोरी करेंगें कर देँगे सब से दूर
में भी फसा था तू भी फसेगा सब जानकर भी
इसीलिए सब जानने के बावजूद भी में अंजान नहीं
खामोश हूं पर अंजान नहीं
सब जानकर भी चुप हु पर अंजान नहीं।